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Archive for ઓક્ટોબર, 2011

ये कैसी शाम है
कैसी धुन्ध छाई है आज
सूरज भी डूब रहा है
और वैसे भी बादल आसमान में
कुछ ज्यादा ही है आज
पार्क की लाइट्स जल नहीं रही है
लगता है फिर से इलैकट्रीसिटी चली गई है
बेंच पर से मैं खड़ा होता हूँ
और चारों और देखता हूँ
बहोत कम लोग दिख रहे है
मैं भी घर जाने की सोचता हूँ
बागीचे के दरवाज़े से बाहर निकलता हूँ
रास्तों पे काफी भीड़ है
कार्स और स्कूटर्स दौड़ादौड़ कर रहे है
ऊपर देखता हूँ
पंछी भी घर को लौट रहे है
कहीं दूर से पटाखे की आवाज़ आती है
अरे हां, याद आया
कल तो दिवाली है.
ये भी याद आया की
मिठाइयां लानी है, खानी है
पॉकेट में हाथ डालता हूँ
दस का नोट, पचास का नोट, सौ का नोट
सब मिलाके बहुत नहीं है.
मिठाई आएगी शायद, पटाखे नहीं आयेंगे.
चलो, इस बार की दिवाली भी
अगले वक़्त की तराह ही जायेगी.

– Prakash Khanchandani

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